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श्री साई अमृत कथा क्या है?

सुमीत पोंदा ‘भाईजी’
[माध्यम, श्री साई अमृत कथा]

साई बाबा के महासमाधि लेने के पूर्व और आज, जब उनके समाधीस्थ होने को लगभग एक सौ वर्ष होने को आ गए हैं, उनके नाम-स्मरण मात्र से लोगों को सुख की अनुभूति होती है. साई बाबा को पाना ज़रा भी मुश्किल नहीं है. उनके निंदक चाहे जो भी कहें, विश्वास करने वालों के लिए, साई बाबा साक्षात, सुलभ देव ही हैं. इस कलयुग के देव. उन्हें पाना और उनसे पाना कतई मुश्किल नहीं है लेकिन दुविधा वहाँ से शुरू होती है जब लोग साई को तो मानते हैं लेकिन साई की नहीं मानते. यही दु:ख साई को अपने सशरीर होने के दौरान भी सालता था और वो अक्सर कहते कि उनका भण्डार तो देने के लिए खुला है लेकिन लोग उनसे वो मांगते ही नहीं जो वो उन्हें देना चाहते हैं.

 

ये आज भी उतना ही सच है. शिरडी का समाधि मंदिर हो, गावों के चबूतरे पर बिठाई हुए साई की मूर्ति या शहरों की गलियों में साई बाबा के मंदिर हों, लोगों की कतार कम होने का नाम ही नहीं लेती. दीन-दु:खी हों या कोई सेठ, साई से हम सब, बहुत सारा मांगने जाते हैं और वो खुले हाथ से हमें देता जाता है. सच तो यह है कि हम मांगते-मांगते थक जाते हैं लेकिन उसकी करुणा में कोई कमी नहीं आती है. वो देने से नहीं थकता. हम साई से वो सब कुछ मांगते ही रहते हैं, जो हमें चाहिए होता है, वो सब कुछ जो इस जीवन से पहले या इस जीवन के साथ खत्म हो जाने वाला है. हम अपना सुख इन्ही चीज़ों में ढूंढते रहते हैं, तब इस साई का असल खेल शुरू होता है. साई की करुणा हमें इन चीज़ों के नश्वर होने का अहसास कराने लगती है. हमें यह महसूस होने लगता है कि जिन चीज़ों में हम अपना सुख ढूंढ रहे थे, वो तो असल में खत्म हो जाने वाली हैं और चूंकी हमने अपना सुख उनके साथ बाँध दिया है, उनके साथ ही सुख भी खत्म हो सकता है. तब साई से हम वो मांगने लगते हैं, जो साई हमें देना चाहता है. ये साई का चमत्कार ही होता है.

 

जब तक साई ने अपने सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञाता होने के प्रमाण नहीं दिए थे, अधिकतर लोग उन्हें एक पागल फकीर ही मानते थे. उनका मजाक उड़ाते, पत्थर मारते, ताने देते और उनकी उलाहना करते. ऐसी गणना की जाती है कि अपने दूसरे प्रवास के दौरान साई शिरडी में लगभग साठ साल रहे. १९१८ में उनकी महासमाधि से मात्र सात वर्ष पूर्व, उनकी आज्ञा से अन्ना साहेब दाभोलकर को उनका सच्चरित्र लिखने की प्रेरणा हुई – १९११ में. चूंकी श्री दाभोलकर भी १९१६ तक सरकारी नौकरी में थे, उनका इन सात सालों में हर समय शिरडी में रहना भी संभव नहीं था. दाभोलकर उर्फ हेमाडपंत द्वारा साई सच्चरित्र के ५३ अध्यायों में ९३०८ ओवियों (पद्यांश) में १९११ सेलेकर १९१८ तक बाबा की रची हुई मात्र २६१ लीलाओं का वर्णन है. १९११ के पहले का बाबा की लीलाओं का खज़ाना अलग-अलग जगह पर छितरा पड़ा है. साई की अधिकाँश लीलाओं का कहीं कोई आधिकारिक वर्णन नहीं मिलता. १९१८ में बाबा के सदेह से सदैव होने के बाद भी उनके चमत्कारों का सिलसिला थमा नहीं है बल्कि उनके करोड़ों भक्तों को तो प्रत्येक क्षण उनके चमत्कारों का अहसास प्रति पल होता ही रहता है. साई कथा अनंत है.

 

हम सभी इर्ष्या करते हैं दाभोलकर जी से, जिन्हें बाबा के आशीर्वाद से अमरत्व प्राप्त हुआ है. साई के इस सच्चरित्र को आज प्रायः सभी साई-भक्त अपने पास रखते हैं. दाभोलकरजी का भी मानना था कि बाबा ने स्वयं अपना सच्चरित्र रचा है. ऐसा बाबा ने उन्हें अपना सच्चरित्र रचने की आज्ञा देते समय कहा था. इस सच्चरित्र को ग्रन्थ भी माना जाता है क्योंकि इसमें न सिर्फ बाबा के चमत्कारों का उल्लेख है बल्कि श्रीमद्भ भागवत, भगवद्भ गीता, रामायण, वेदों और उपनिषदों का सार भी है. दाभोलकरजी को साधुवाद.

 

साई के श्रद्धालु कृतज्ञ भाव से इसी साई सच्चरित्र में उल्लेखित बाबा की लीलाओं को पढ़ते हैं और साई को अपने नज़दीक पाते हैं. अधिकांश श्रद्धालु इस ग्रन्थ को बाबा के चमत्कारों का लेखा-जोखा मान कर पढ़ते हैं और चमत्कृत होते हैं. हम में से अधिकांश यह नहीं समझते कि बाबा कि प्रत्येक लीला के पीछे जो चमत्कार होता था उससे वे किसी न किसी में संस्कार डालने का काम भी करते थे और अपने भक्तों को सदमार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते थे. यह दरअसल, इस साई सच्चरित्र का मर्म है. इसे यदि हम कहानियों की तरह पढेंगे तो किवदंती ही मान लेंगे लेकिन यदि प्रत्येक लीला के पीछे बाबा द्वारा रोपे गए संस्कार को आत्मसात कर लेंगे तो अपने जीवन को अधक बेहतर बना सकेंगे.

 

कहा जाता है कि जीवन जीने कि कला सीखनी हो तो रामायण का अध्ययन करना चाहिए और मरने की कला सीखनी हो तो श्रीमद्भ भागवत महापुराण को समझना चाहिए. मेरा मानना है कि यदि जीवन और मरण, दोनों ही कला में पारंगत होना हो तो साई बाबा की लीलाओं को समझकर आत्मसात करना चाहिए.

 

श्री साई अमृत कथा, श्री साई बाबा की प्रेरणा से एक प्रयास है, साई के श्रद्धालुओं में इन लीलाओं के श्रवण मात्र से उनका मर्म पहुचाने का जिससे वे अपना जीवन अधिक बेहतर बना सकें और दूसरों के जीवन में सुख घोलें और अंत में शांति की अनुभूती के साथ साई बाबा के साथ एकाकार हो सकें.

 

श्री सद्गगुरु साईनाथार्पणमस्तु. शुभंभवतु.